Thursday, 14 May 2020

समय को पहचानो part--1।

मनुष्य ने समय को का परखा है? इस तिथि का किसी इतिहास में उल्लेख नहीं है । केवल अनुमान मात्र लगाया जा सकत है । जब मनुष्य ने देखा होगा कि सूर्य निकलने पर चारो तरफ उजला फैलता है ,प्रकाश होता है , तो उसने इसे दिन माना और सूर्य डूब जाने के समय रात को माना । इस प्रकार समय का दिन और रात में विभाजन किया । फिर अंको के आविष्कार के साथ- साथ उसने समय की गड़न शुरू किया । पहले वह दीवारों पर लकीरें खींचकर गणना करता था । इस प्रकार समय को नापना शुरू कर दिया । फिर आगे चलकर उसने दिन , सप्ताह और वर्ष बनाएं कैलेंडर बनाया ।प्रथ्वी पर सूर्य का ज्ञान प्राप्त किया। उसने घूमने के क्रिया के ज्ञान के साथ साथ सूर्योदय और सूर्यास्त का समय जानने लगा । किस दिन ,कब सूर्योदय, सूर्यास्त होगा , इसका ज्ञान प्राप्त करने लगा । समय का ज्ञान हो गया मानुष को।इस ज्ञान के द्वारा प‌्त्येक चराचर की आयु निर्धारण करने में सफल हो गया ।
मनुष्य ने समय को जानकर सभ्यता की दिशा में एक बहुत बाद कदम उठा लिया ,पर समय को उसने नहीं पहचाना ।
https://youtu.be/n3xnK2RfHxo

Wednesday, 29 April 2020

शहडोल मप


शहडोल सोमवार को शहडोल में कोरोना पॉजीटिव दो मरीजों के मिलने के बाद आज बुधवार को तीसरे कोरोना पॉजीटिव मिलने की पुष्टि, जिला प्रशासन द्वारा की गई है, हांलाकि मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. ओपी चौधरी ने इस संदंर्भ में सिर्फ तीसरे कोरोना मरीज के होने की पुष्टि भर की है।
मरीज अभी कहा है, उसका सैंपल कब लिया गया था, उसके ईलाज और उसके संपर्कियों के संबंध में जिला प्रशासन क्या कर रहा है, यह जानकारी अभी प्रतिक्षित है। सिर्फ अभी यह जानकारी सामने आई है, कि कोरोना पॉजीटिव 60 साल की महिला कुबरिया कोल पति शिवलाल कोल है और वह पपौन्ध थाना क्षेत्र के ओदारी की है।इस सदंर्भ में यह भी जानकारी सामने आई है कि महिला बीते दिनों सागर से शहडोल आई थी, 26 अपै्रल को उसका सैंपल भी लिया गया था, पुराने मामले की तरह ही जिला प्रशासन और स्वास्थ्य अमले की लापरवाही भी इस मामले में भी खुलकर सामने आई, महिला का सैंपल लेने के बाद उसे क्वारंटीन या आईसोलेट करवाने की जगह, उसे होम क्वारंटीन की सलाह देकर, जाने दिया गया था। आज जब महिला की कोरोना पॉजीटिव रिपोर्ट आई तो, प्रशासन हरकत में आया, खबर यह भी है कि प्रशासन ने उसके सेलफोन पर जब कॉल किया तो, चर्चा नही हो पाई, इसके बाद पुलिस की टीम महिला के पते पर पहुंची, यह भी जानकारी आई है कि महिला घर पर ही टीम को मिली है, जिसके बाद महिला को मेडिकल कॉलेज लाया जाना है।

यह हुआ था इससे पहले
28 अप्रैल को डियन कांउसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार शहडोल संभाग के शहडोल जिले के निवासी 15 वर्षीय किशोरी मोनिका बैगा और 26 वर्षीय भरत ङ्क्षसह के कोरोना पॉजिटिव होने की पुष्टि आईसीएमआर द्वारा शाम 5 बजे जारी रिपोर्ट में की गई थी। इस टेस्ट रिपोर्ट में इस बात का भी उल्लेख किया गया थी कि दोनो के सैंपल 23 अपै्रल को कलेक्ट किये गये थे, जिन्हे 25 अपै्रल 10 बजे यहां भेजे गये थे। मोनिका बैगा और भरत ङ्क्षसह के साथ दो और सैंपल भेजे गये थे। इन दोनो की रिपोर्ट निगवेटिव आई है, जबकि मोनिका और भरत की रिपोर्ट पॉजिटिव आई है।
रिपोर्ट से पहले दिया छोड
शनिवार की शाम को रिपोर्ट जारी होने से पहले ही दोनो को क्वारंटीन सेंटरो में रखने के बाद छोड दिया गया था, इन दोनो कों मेडिकल कॉलेज में ला कर उपचार करने की खबर थी।
जिले में लॉक डाउन वन व टू के लगभग 1 माह से अधिक का समय बीतने के बाद गोहपारू पर क्वारंटाइन किये गये दो श्रमिकों की जांच क बाद उनकी रिपोर्ट पॉजीटिव बताई गई थी। कलेक्टर डॉ. सतेन्द्र सिंह एवं मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. ओ.पी. चौधरी ने दूरभाष पर की गई चर्चा पर इसकी पुष्टि भी की थी।
अन्यत्र से मजदूर लाना पड़ा महंगा
शिवराज सरकार द्वारा प्रदेश के अन्य जिलों में फंसे मजदूरों को उनके घर पहुंचाने की कवायत महंगी पड़ती नजर आ रही है। इस कवायत ने शहडोल कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक व आमजनता की लॉक डाउन की पूरी मेहनत पर पानी फेर दिया। जिन दो मजदूरों को कोरोना पॉजीटिव पाया गया है, उसमें एक मजदूर महाराष्ट्र के अहमद नगर से यहां लाया गया था, वहीं दूसरे मजदूर को विदिशा से लाने की खबर है। हालाकि अधिकारिक तौर पर अभी इसकी प्रेस विज्ञप्ति जारी नहीं हुई है, यह बात भी सामने आई है कि दोनों मजदूरों को क्वारंटाइन सेंटर से छुट्टी होने के बाद यह रिपोर्ट आई है।
चिकित्सकों को सौपी जिम्मेदारी
खबर यह भी है कि दोनों को क्वारंटाइन सेंटर से छुट्टी दे दी गई थी, बाद में रिपोर्ट पॉजीटिव आने के कारण रिपोर्ट ने चिंताओं को और बढ़ा दिया है, हालाकि यह खबर आने के बाद कलेक्टर स्वास्थ्य अमले को लेकर खुद क्षेत्र के लिए रवाना हो गये ।

एक पण्डित

 एक गांव एक पंडित व्यति राहत था औरको

उसके दो बेटे थे  एक का नाम बंटी व छोटे का नाम
शक्ति था बस नाम भर का ही शक्ति (सरल) और उसे कुछ कम नहीं आता था |
शक्ति घर मे सब लोगो का खाना अकेले ही खा जाता था  उसके घर वाले बहुत परेशान रहा करते थे l

दूसरे दिन रिलीटव के यह शादी हो रहा था वहां अच्छा अच्छा पकवान बाना हुआ था शक्ति भोजन खाना सुरु किया तो 20 लोगो का खाना अकेले ही गया बोल रहा दाने दाने खाने 






Thursday, 6 February 2020



  1. Binda Mahadevi Verma 


भीत-सी आंखोंवाली उस दुर्बल, छोटी और अपने-आप ही सिमटी-सी बालिका पर दृष्टि डाल कर मैंने सामने बैठे सज्जन को, उनका भरा हुआ प्रवेशपत्र लौटाते हुए कहा,‘आपने आयु ठीक नहीं भरी है. ठीक कर दीजिए, नहीं तो पीछे कठिनाई पड़ेगी.’
‘नहीं यह तो गत आषाढ़ में चौदह की हो चुकी,’ सुनकर मैंने कुछ विस्मित भाव से अपनी उस भावी विद्यार्थिनी को अच्छी तरह देखा, जो नौ वर्षीय बालिका की सरल चंचलता से शून्य थी और चौदह वर्षीय किशोरी के सलज्ज उत्साह से अपरिचित.
उसकी माता के संबंध में मेरी जिज्ञासा स्वगत न रहकर स्पष्ट प्रश्न ही बन गई होगी, क्योंकि दूसरी ओर से कुछ कुंठित उत्तर मिला,‘मेरी दूसरी पत्नी है, और आप तो जानती ही होंगी.’ और उनके वाक्य को अधसुना ही छोड़कर मेरा मन स्मृतियों की चित्रशाला में दो युगों से अधिक समय की भूल के नीचे दबे बिंदा या विन्ध्येश्वरी के धुंधले चित्र पर उंगली रखकर कहने लगा,‘ज्ञात है, अवश्य ज्ञात है.’


Mahadevi Verma’s Story Binda
बिंदा मेरी उस समय की बाल्यसखी थी, जब मैंने जीवन और मृत्यु का अमिट अन्तर जान नहीं पाया था. अपने नाना और दादी के स्वर्ग-गमन की चर्चा सुनकर मैं बहुत गम्भीर मुख और आश्वस्त भाव से घर भर को सूचना दे चुकी थी कि जब मेरा सिर कपड़े रखने की आल्मारी को छूने लगेगा, तब मैं निश्चय ही एक बार उनको देखने जाऊंगी. न मेरे इस पुण्य संकल्प का विरोध करने की किसी को इच्छा हुई और न मैंने एक बार मरकर कभी न लौट सकने का नियम जाना. ऐसी दशा में, छोटे-छोटे असमर्थ बच्चों को छोड़कर मर जाने वाली मां की कल्पना मेरी बुद्धि में कहां ठहरती. मेरा संसार का अनुभव भी बहुत संक्षिप्त-सा था. अज्ञानावस्था से मेरा साथ देने वाली सफ़ेद कुत्ती सीढ़ियों के नीचे वाली अंधेरी कोठरी में आंख मूंदे पड़े रहने वाले बच्चों की इतनी सतर्क पहरेदार हो उठती थी कि उसका गुर्राना मेरी सारी ममता-भरी मैत्री पर पानी फेर देता था. भूरी पूसी भी अपने चूहे जैसे नि:सहाय बच्चों को तीखे पैने दांतों में ऐसी कोमलता से दबाकर कभी लाती, कभी ले जाती थी कि उनके कहीं एक दांत भी न चुभ पाता था. ऊपर की छत के कोने पर कबूतरों का और बड़ी तस्वीर के पीछे गौरैया का जो भी घोंसला था, उसमें खुली हुई छोटी-छोटी चोचों और उनमें सावधानी से भरे जाते दोनों और कीड़े-मकोड़ों को भी मैं अनेक बार देख चुकी थी. बछिया को हटाते हुए ही रंभा-रंभा कर घरभर को यह दु:खद समाचार सुनाने वाली अपनी श्यामा गाय की व्याकुलता भी मुझसे छिपी न थी. एक बच्चे को कन्धे से चिपकाए और एक उंगली पकड़े हुए जो भिखरिन द्वार-द्वार फिरती थी, वह भी तो बच्चों के लिए ही कुछ मांगती रहती थी. अत: मैंने निश्चित रूप से समझ लिया था कि संसार का सारा कारबार बच्चों को खिलाने-पिलाने, सुलाने आदि के लिए ही हो रहा है और इस महत्वपूर्ण कर्तव्य में भूल न होने देने का काम मां नामधारी जीवों को सौंपा गया है.
और बिंदा के भी तो मां थी जिन्हें हम पंडिताइन चाची और बिंदा नई अम्मा कहती थी. वे अपनी गोरी, मोटी देह को रंगीन साड़ी से सजे-कसे, चारपाई पर बैठ कर फूले गाल और चिपटी-सी नाक के दोनों ओर नीले कांच के बटन सी चमकती हुई आंखों से युक्त मोहन को तेल मलती रहती थी. उनकी विशेष कारीगरी से संवारी पाटियों के बीच में लाल स्याही की मोटी लकीर-सा सिंदूर उनींदी सी आंखों में काले डोरे के समान लगने वाला काजल, चमकीले कर्णफूल, गले की माला, नगदार रंग-बिरंगी चूड़ियां और घुंघरूदार बिछुए मुझे बहुत भाते थे, क्योंकि यह सब अलंकार उन्हें गुड़िया की समानता दे देते थे.
यह सब तो ठीक था; पर उनका व्यवहार विचित्र-सा जान पड़ता था. सर्दी के दिनों में जब हमें धूप निकलने पर जगाया जाता था, गर्म पानी से हाथ मुंह धुलाकर मोजे, जूते और ऊनी कपड़ों से सजाया जाता था और मना-मनाकर गुनगुना दूध पिलाया जाता था, तब पड़ोस के घर में पंडिताइन चाची का स्वर उच्च-से उच्चतर होता रहता था. यदि उस गर्जन-तर्जन का कोई अर्थ समझ में न आता, तो मैं उसे श्याम के रंभाने के समान स्नेह का प्रदर्शन भी समझ सकती थी; परन्तु उसकी शब्दावली परिचित होने के कारण ही कुछ उलझन पैदा करने वाली थी. ‘उठती है या आऊं’, ‘बैल के-से दीदे क्या निकाल रही है’, ‘मोहन का दूध कब गर्म होगा ’, ‘अभागी मरती भी नहीं’ आदि वाक्यों में जो कठोरता की धारा बहती रहती थी, उसे मेरा अबोध मन भी जान ही लेता था.
कभी-कभी जब मैं ऊपर की छत पर जाकर उस घर की कथा समझने का प्रयास करती, तब मुझे मैली धोती लपेटे हुए बिंदा ही आंगन से चौके तक फिरकनी-सी नाचती दिखाई देती. उसका कभी झाड़ू देना, कभी आग जलाना, कभी आंगन के नल से कलसी में पानी लाना, कभी नई अम्मा को दूध का कटोरा देने जाना, मुझे बाज़ीगर के तमाशा जैसे लगता था; क्योंकि मेरे लिए तो वे सब कार्य असम्भव-से थे. पर जब उस विस्मित कर देने वाले कौतुक की उपेक्षा कर पंडिताइन चाची का कठोर स्वर गूंजने लगता, जिसमें कभी-कभी पंडित जी की घुड़की का पुट भी रहता था, तब न जाने किस दु:ख की छाया मुझे घेरने लगती थी. जिसकी सुशीलता का उदाहरण देकर मेरे नटखटपन को रोका जाता था, वहीं बिंदा घर में चुपके-चुपके कौन-सा नटखटपन करती रहती है, इसे बहुत प्रयत्न करके भी मैं न समझ पाती थी. मैं एक भी काम नहीं करती थी और रात-दिन ऊधम मचाती रहती; पर मुझे तो मां ने न मर जाने की आज्ञा दी और न आंखें निकाल लेने का भय दिखाया. एक बार मैंने पूछा भी,‘क्या पंडिताइन चाची तुमरी तरह नहीं है?’ मां ने मेरी बात का अर्थ कितना समझा यह तो पता नहीं, उनके संक्षिप्त ‘हैं’ से न बिंदा की समस्या का समाधान हो सका और न मेरी उलझन सुलझ पाई.
बिंदा मुझसे कुछ बड़ी ही रही होगी; परन्तु उसका नाटापन देखकर ऐसा लगता था, मानों किसी ने ऊपर से दबाकर उसे कुछ छोटा कर दिया हो. दो पैसों में आने वाली खंजड़ी के ऊपर चढ़ी हुई झिल्ली के समान पतले चर्म से मढ़े और भीतर की हरी-हरी नसों की झलक देने वाले उसके दुबले हाथ-पैर न जाने किस अज्ञात भय से अवसन्न रहते थे. कहीं से कुछ आहट होते ही उसका विचित्र रूप से चौंक पड़ना और पंडिताइन चाची का स्वर कान में पड़ते ही उसके सारे शरीर का थरथरा उठना, मेरे विस्मय को बढ़ा ही नहीं देता था, प्रत्युत् उसे भय में बदल देता था. और बिंदा की आंखें तो मुझे पिंजड़े में बन्द चिड़िया की याद दिलाती थीं.
एक बार जब दो-तीन करके तारे गिनते-गिनते उसने एक चमकीले तारे की ओर उंगली उठाकर कहा,‘वह रही मेरी अम्मा’ तब तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा. क्या सब-की एक अम्मा तारों में होती है ओर एक घर में? पूछने पर बिंदा ने अपने ज्ञान-कोष में से कुछ कण मुझे दिये और तब मैंने समझा कि जिस अम्मा को ईश्वर बुला लेता है, वह तारा बनकर ऊपर से बच्चों को देखती रहती है और जो बहुत सजधज से घर में आती है, वह बिंदा की नई अम्मा जैसी होती है. मेरी बुद्धि सहज ही पराजय स्वीकार करना नहीं जानती, इसी से मैंने सोचकर कहा,‘तुम नई अम्मा को पुरानी अम्मा क्यों नहीं कहती, फिर वे न नई रहेंगी और न डांटेंगी.’
बिंदा को मेरा उपाय कुछ जंचा नहीं, क्योंकि वह तो अपनी पुरानी अम्मा को खुली पालकी में लेटकर जाते और नई को बन्द पालकी में बैठकर आते देख चुकी थी, अत: किसी को भी पदच्युत करना उसके लिए कठिन था.
पर उसकी कथा से मेरा मन तो सचमुच आकुल हो उठा, अत: उसी रात को मैंने मां से बहुत अनुनयपूर्वक कहा,‘तुम कभी तारा न बनना, चाहे भगवान कितना ही चमकीला तारा बनावें.’ मां बेचारी मेरी विचित्र मुद्रा पर विस्मित होकर कुछ बोल भी न पाई थी कि मैंने अकुंठित भाव से अपना आशय प्रकट कर दिया,‘नहीं तो पंडिताइन चाची जैसी नई अम्मा पालकी में बैठकर आ जाएंगी और फिर मेरा दूध, बिस्कुट, जलेबी सब बन्द हो जाएगी- और मुझे बिंदा बनना पड़ेगा.’ मां का उत्तर तो मुझे स्मरण नहीं, पर इतना याद है कि उस रात उसकी धोती का छोर मुट्ठी में दबाकर ही मैं सो पाई थी.
बिंदा के अपराध तो मेरे लिए अज्ञात थे; पर पंडिताइन चाची के न्यायालय से मिलने वाले दण्ड के सब रूपों से मैं परिचित हो चुकी थी. गर्मी की दोपहर में मैंने बिंदा को आंगन की जलती धरती पर बार-बार पैर उठाते ओर रखते हुए घंटों खड़े देखा था, चौके के खम्भे से दिन-दिन भर बंधा पाया था और भूख से मुरझाए मुख के साथ पहरों नई अम्मा ओर खटोले में सोते मोहन पर पंखा झलते देखा था. उसे अपराध का ही नहीं, अपराध के अभाव का भी दण्ड सहना पड़ता था, इसी से पंडित जी की थाली में पंडिताइन चाची का ही काला मोटा और घुंघराला बाल निकलने पर भी दण्ड बिंदा को मिला. उसके छोटे-छोटे हाथों से धुल न सकने वाले, उलझे, तेलहीन बाल भी अपने स्वाभाविक भूरेपन ओर कोमलता के कारण मुझे बड़े अच्छे लगते थे. जब पंडिताइन चाची की कैंची ने उन्हें कूड़े के ढेर पर, बिखरा कर उनके स्थान को बिल्ली की काली धारियों जैसी रेखाओं से भर दिया तो मुझे रुलाई आने लगी; पर बिंदा ऐसे बैठी रही, मानों सिर और बाल दोनों नई अम्मा के ही हों.
और एक दिन याद आता है. चूल्हे पर चढ़ाया दूध उफना जा रहा था. बिंदा ने नन्हें-नन्हें हाथों से दूध की पतीली उतारी अवश्य; पर वह उसकी उंगलियों से छूट कर गिर पड़ी. खौलते दूध से जले पैरों के साथ दरवाज़े पर खड़ी बिंदा का रोना देख मैं तो हतबुद्धि सी हो रही. पंडिताइन चाची से कह कर वह दवा क्यों नहीं लगवा लेती, यह समझाना मेरे लिए कठिन था. उस पर जब बिंदा मेरा हाथ अपने जोर से धड़कते हुए हृदय से लगाकर कहीं छिपा देने की आवश्यकता बताने लगी, तब तो मेरे लिए सब कुछ रहस्मय हो उठा.
उसे मैं अपने घर में खींच लाई अवश्य; पर न ऊपर के खण्ड में मां के पास ले जा सकी और न छिपाने का स्थान खोज सकी. इतने में दीवारें लांघ कर आने वाले, पंडिताइन चाची के उग्र स्वर ने भय से हमारी दिशाएं रूंध दीं, इसी से हड़बड़ाहट में हम दोनों उस कोठरी में जा घुसीं, जिसमें गाय के लिए घास भरी जाती थी. मुझे तो घास की पत्तियां भी चुभ रही थीं, कोठरी का अंधकार भी कष्ट दे रहा था; पर बिंदा अपने जले पैरों को घास में छिपाए और दोनों ठंडे हाथों से मेरा हाथ दबाए ऐसे बैठी थी, मानों घास का चुभता हुआ ढेर रेशमी बिछोना बन गया हो.
मैं तो शायद सो गई थी; क्योंकि जब घास निकालने के लिए आया हुआ गोपी इस अभूतपूर्व दृश्य की घोषणा करने के लिए कोलाहल मचाने लगा, तब मैंने आंखें मलते हुए पूछा,‘क्या सबेरा हो गया?’
मां ने बिंदा के पैरों पर तिल का तेल और चूने का पानी लगाकर जब अपने विशेष सन्देशवाहक के साथ उसे घर भिजवा दिया, तब उसकी क्या दशा हुई, यह बताना कठिन है; पर इतना तो मैं जानती हूं कि पंडिताइन चाची के न्याय विधान में न क्षमता का स्थान था, न अपील का अधिकार.
फिर कुछ दिनों तक मैंने बिंदा को घर-आंगन में काम करते नहीं देखा. उसके घर जाने से मां ने मुझे रोक दिया था; पर वे प्राय: कुछ अंगूर और सेब लेकर वहां हो आती थीं. बहुत ख़ुशामद करने पर रूकिया ने बताया कि उस घर में महारानी आई हैं. ‘क्या वे मुझसे नहीं मिल सकती’ पूछने पर वह मुंह में कपड़ा ठूंस कर हंसी रोकने लगी. जब मेरे मन का कोई समाधान न हो सका, तब मैं एक दिन दोपहर को सभी की आंख बचाकर बिंदा के घर पहुंची. नीचे के सुनसान खण्ड में बिंदा अकेली एक खाट पर पड़ी थी. आंखें गड्ढे में धंस गई थीं, मुख दानों से भर कर न जाने कैसा हो गया था और मैली-सी चादर के नीचे छिपा शरीर बिछौने से भिन्न ही नहीं जान पड़ता था. डॉक्टर, दवा की शीशियां, सिर पर हाथ फेरती हुई मां और बिछौने के चारों चक्कर काटते हुए बाबूजी ने बिना भी बीमारी का अस्तित्व है, यह मैं नहीं जानती थी, इसी से उस अकेली बिंदा के पास खड़ी होकर मैं चकित-सी चारों ओर देखती रह गई. बिंदा ने ही कुछ संकेत और कुछ अस्पष्ट शब्दों में बताया कि नई अम्मा मोहन के साथ ऊपर खण्ड में रहती हैं, शायद चेचक के डर से. सबेरे-शाम बरौनी आकर उसका काम कर जाती है.
फिर तो बिंदा को दुखना सम्भव न हो सका; क्योंकि मेरे इस आज्ञा-उल्लंघन से मां बहुत चिन्तित हो उठी थीं.
एक दिन सबेरे ही रूकिया ने उनसे न जाने क्या कहा कि वे रामायण बन्दर कर बार-बार आंखें पोंछती हुई बिंदा के घर चल दीं. जाते-जाते वे मुझे बाहर न निकलने का आदेश देना नहीं भूली थीं, इसी से इधर-उधर से झांककर देखना आवश्यक हो गया. रूकिया मेरे लिए त्रिकालदर्शी से कम न थी; परन्तु वह विशेष अनुनय-विनय के बिना कुछ बताती ही नहीं थी और उससे अनुनय-विनय करना मेरे आत्म-सम्मान के विरुद्ध पड़ता था. अत: खिड़की से झांककर मैं बिंदा के दरवाज़े पर जमा हुए आदमियों के अतिरिक्त और कुछ न देख सकी और इस प्रकार की भ‌ीड़ से विवाह और बारात का जो संबंध है, उसे मैं जानती थी. तब क्या उस घर में विवाह हो रहा है, और हो रहा है तो किसका? आदि प्रश्न मेरी बुद्धि की परीक्षा लेने लगे. पंडित जी का विवाह तो तब होगा, जब दूसरी पंडिताइन चाची भी मर कर तारा बन जाएंगी और बैठ न सकने वाले मोहन का विवाह संभव नहीं, यही सोच-विचार कर मैं इस परिणाम तक पहुंची कि बिंदा का विवाह हो रहा है ओर उसने मुझे बुलाया तक नहीं. इस अचिन्त्य अपमान से आहत मेरा मन सब गुड़ियों को साक्षी बनाकर बिंदा को किसी भी शुभ कार्य में न बुलाने की प्रतिज्ञा करने लगा.
कई दिन तक बिंदा के घर झांक-झांककर जब मैंने मां से उसके ससुराल से लौटने के संबंध में प्रश्न किया, तब पता चला कि वह तो अपनी आकाश-वासिनी अम्मा के पास चली गई. उस दिन से मैं प्राय: चमकीले तारे के आस-पास फैले छोटे तारों में बिंदा को ढूंढ़ती रहती; पर इतनी दूर से पहचानना क्या संभव था?
तब से कितना समय बीत चुका है, पर बिंदा ओर उसकी नई अम्मा की कहानी शेष नहीं हुई. कभी हो सकेगी या नहीं, इसे कौन बता सकता है ?